Slow Travel, Immersive Tales
 

Kareri Lake with Kids: Day Three

Day Three.

Lyoti Campsite to Kareri Lake

Today was our last leg of the trek to kareri lake which was approx four kms from here. A good breakfast boosted the energy levels, tents were folded and we started onto an ascent which was moderate in gradient compared to yesterday’s relentless climb. This part of trek was mostly along the course of river, on boulders or along those boulders. When the river tumbled too dangerously, path skirted it by taking roughly hewn stone stairs and again came back to the river. So we did what we could do and river did what it could, but we kept close to each other. This gurgling Nyund was a sought after companion with its multitudes of pools, falls and small eddies. While I prefered to sit close to falls, kids loved the pools and eddies and Manish juggled between camera, kids and wife.


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Seven things to do in Tal Chapar Sanctuary

‘Wild life’ travel is an expensive business. Add the mountain of difficulty in getting accommodation inside the sanctuaries, further add the randomness of the routes allotted to you in the Jungle, and you think twice before embarking on such trips. But the thrill, unpredictability, green cocoon, sounds and smell, and visuals offered are unparalleled so we always end up coughing up the money beyond our reach.

meet me at Tal Chapar.

meet me at Tal Chapar.


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सुनो नंदी!

दक्षिण में पाँव पाँव पर प्रभु अपने साकार रूप में विराजमान है. कहीं भी निकल पड़िए, श्लोक उच्चारण, मंदिर की घंटी, नाद के स्वर, हाथों में पूजन सामग्री और मुख पर प्रभु-दर्शन का भाव लिए आपको श्रद्धालु निरंतर दिखाई देंगे। प्रसिद्ध मंदिरों की तो बात ही क्या करनी, यहाँ-वहाँ बने छोटे छोटे मंदिर भी आपको भाव में डुबोने में सक्षम हैं. ऐसा ही एक मंदिर है भोग-नन्दीश्वर, बंगलोर के निकट ही, नंदी हिल्स नाम से प्रसिद्ध पहाड़ी की तलहटी में.

नवीं सदी में बने इस मंदिर में पहुंचने पर तुम्हे वहां विराजमान देखकर बच्चों को समझ आ गया कि भगवान शिव का मंदिर है. और ये भी कि नन्दीश्वरा का अर्थ है नंदी के ईश्वर। किन्तु एक बालिका को तुम्हारे कान में कुछ कहता देख अचरज़ हुआ. कौतूहल जगा.

सुनो नंदी!

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डबल-डेकर रुट ब्रिज, चेरापूंजी, Root bridges of Meghalaya.

Double Decker Root bridge , Cherrapunji

कांपते पैरों को सहारा देने के लिए बाँस की लकड़ी को और कसकर पकड़ा। एक एक सीढी पर दस-दस सांस फुंकी जा रही थी. और अभी तो पंद्रह सौ सीढियाँ बाकी थी. आगे को चल रहे हमारे गाइड बेथ से छोटे बेटे को, जो तब पांच वर्ष का ही था, खेल में उलझाने को कहा. लेकिन खेल के साथ ही चढ़ाई भी जारी रखनी थी. अगर कोई पोखर, ताल-तलैया होते तो वो निर्बाध रूप से कंकड़ फेंकते हुए चल लेता …लेकिन हम तो एक बेहद संकरे रस्ते पर थे जो दोनों ओर से घने, विशालकाय, आपस में गुत्थे -मुत्थे वृक्षों, लताओं, झाड़ियों से घिरा था. राह कठिन थी और बेटे को चलायमान रखना दुश्वार होता लग रहा था. तभी नज़र पड़ी Burmese Grapes (Bacuuarea Ramiflora) के पेड़ पर जिसे खासी भाषा में ‘सोह-राम -डॉन्ग’ के नाम से जाना जाता है. नींबू के आकर के फलों से लदा पड़ा था और खड़ा खड़ा था निष्चल, माँ के दिमाग से अनजान। बेथ को कहकर कई सारे फलों के गुच्छे तुड़वाये और बेथ को एक-एक कर बेटे को देने के लिए कहा. माँ के दिमाग का अनुभवी तार बेटे के नव हिरना मन से जुड़ गया. उसने उन्हें इधर-उधर फेंकना शुरू किया और चढ़ाई के बारे में भूल गया.

जैसे जैसे वो ये फल-गोले फेंकता गया, एक-एक सीधी चढ़ता भी गया.

“मुझ पर नहीं फेंकना”, थकी सी आवाज़ में मैंने उससे चुहल की.

ऐसे ही हम सौ सीढी और चढ़ गए. अब हम चढ़ाई के सबसे कठिन हिस्से पर थे. नीचे देखने पर चक्कर से आने लगे. बैठ कर जरा सी आँख बंद कर अपने आप को पुनः व्यवस्थित किया कि तभी एक फल का गोला मेरे सर पर आ गिरा। गुस्से का गुबार उठे उससे पहले ही खिलखिलाते हुए नन्हे क़दमों के तेज़ी से ऊपर भागने की मोरपंखिया रुनझुन ने उस गुबार को रोक दिया। प्रमुदित होकर मैंने खुद ही अपनी पीठ थपथपाई कि मैंने लोक-जैविकी को इस डबल-डेकर रुट ब्रिज, जो कि लोक-इंजीनियरिंग का प्रशस्त उदहारण है, की ट्रैकिंग को संपन्न करने में उपयोग किया।

The fruit balls

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कम्बोडिया: एक संक्षिप्त परिचय , Temples of Cambodia

ऐरावत पर इंद्र देव, बांते स्रेई , कंबोडिया

भारत को एशिया की संस्कृति का पालना कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. श्री लंका, भूटान, नेपाल, म्यांमार, चीन, से लेकर थाईलैंड, कम्बोडिआ, मलेशिया, इंडोनेशिया, और सुदूर पूर्व में कोरिया तथा जापान, सभी देशो की संस्कृति में भारतकी अमिट छाप आज भी दिखाई पड़ती है. अधिकांश देशों में यह छाप जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानने की मनुष्य की कोशिश अर्थात धर्म और अध्यात्म में मुख्य रूप से अंकित है. बुद्ध धर्म तो इनमे सभी जगहों पर आज भी विद्यमान है, किन्तु हिन्दू धर्म का प्रभाव उससे भी पहले, दूर तक फैला था. इन्ही अतीत के पन्नों में से आज चुनते हैं कंबोडिया का पृष्ठ।

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Owned and Disowned

“Do not go to that side Madam,” the guard came running after me.

Puzzled, I turned and looked at him.
‘What happened?’

‘The owners of that side of building scold us, if students or visitors go to their side.’

‘But where are the owners?’ wondered I.

‘They stay at the back side of this property.’

This was intriguing. No! Blasphemous, to abandon this colonial style mansion to rot and decrepit and stay at the back, choosing to ignore the grandness of this Bungalow.

Lutyen’s Delhi, wide roads and tree canopy


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