Spring in the City

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सुबह की सैर पर अपनी ही धुन में मगन, अपनी लय-ताल में चलते चलते, दूब पर बैठी एक महिला समूह की चर्चा कान में पड़ी- ‘ अरे, अपने पीली सारी पहनी है तो लग रहा है कि बसंत है… हमारे तो यहाँ तो सभी इस दिन पीले वस्त्र ही पहनते थे तो लगता था कि हाँ बसंत ऋतु आ गयी है….इस शहर में कहाँ सरसों के खेत और क्या बसंत…. फ़्लावर शो देखने जाते हैं तो ज़रूर लगता है कि बसंत आया है….. और या फिर ये हज़ारे के फूल.’ सभी महिलाएँ ठहाका मार कर हंस दी. उस दिन मेरी घंटे भर की सैर में मन में यही कुरेद चली की आख़िर ऐसा क्यों है कि लोगों को इस महानगर में बसंत का एहसास नहीं होता. उन्ही विचारों की लहर ने मुझे यह पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित किया.

जाड़ी की पत्तियों पर छाया बसंत

जाड़ी की पत्तियों पर छाया बसंत


यूँ तो भारतीय दर्शन में छ ऋतु मानी गई हैं- सर्दी, गर्मी, वर्षा, शिशिर, हेमंत और बसंत, किंतु अब प्रचलन में चार ही मुख्य ऋतुओं की मानकता है- सर्दी, गर्मी, वर्षा और बसंत.किन्तु बसंत कब आया और गया पता नहीं चलता। ऐसा क्यों?

भारी भरकम कपड़ों के बोझ से थके कंधे, घहन कोहरा, नल का बर्फीला पानी, घर के सभी खिड़की दरवाजे बंद होने पर भी दिन पर दिन दुबकता तापमान – सर्दी बेधड़क भीतर घुस आती है और अपने होने का एहसास कराती है. गर्मी की ऋतु लाती है महा बलशाली सूर्य और लू के थपेड़े जो मोटे मोटे पर्दों से डरते नहीं बल्कि हमारे ही पसीने छुड़ा देते हैं. यदि कोई एसी में ही बैठा रहे तो बिजली का बिल पसीने छुड़ा देता है यानि हम कितना ही आँख मूंद लें गर्मी अपने आगमन का एहसास करवा ही देती है. और वर्षा ऋतु के तो क्या कहने, बरसे तो मन को सताए और ना बरसे तो मन को सताए. इन तीनो ऋतुओं में चाहे आप घर के बाहर कदम रखें या ना रखें, ये स्वयं आकर आपके घर पर दस्तक देती हैं. पर बसंत ऋतु करे तो क्या करे? तापमान में कमी को हम कहतें है कि सर्दी कम हो गई है, दिन बड़े हो गये हैं, अब थोड़े ही दिनों में गर्मी आने वाली है. तो घर में तो चलकर बसंत ऋतु आती नहीं. घर से बाहर निकलने पर भी बसंत की बहार आपको छू जाए, यह कतई ज़रूरी नहीं. और अगर बसंत को कहीं सरसों के खेत का पर्ययवाची समझ लिया तो जीवन के सभी बसंत गुजर जाएँगे पीले वस्त्र पहनने भर में.

किंतु क्या बसंत सचमुच सरसों पर या बाल्कनी में लगे कुछ महँगे फूलों पर या फ़्लावर शो पर ही आती है? मेरे साथ सुबह की सैर पर चलिए और देखिए की बसंत कहाँ कहाँ महक और दह्करहा है.

घर से बाहर निकलते ही मुलाकात होती है शीशम के पेड़ से. बसंत इस पेड़ पर बहुत पहले पहल आता है. और क्यों ना आए? शीशम की पत्तिया कोणार्क या खजुराहो के शिल्पी की नायिका से भी अधिक मदनीय होतीं हैं. जब बसंत आता है तो पूरा शीशम छोटी छोटी पत्तियों से भर जाता है. अब इतनी सारी नव किशोरिओं का समूह हो और आप आँख उठाकर भी ना देखें तो भला बसंत क्या करे?

शीशम की किशोरियाँ/ sheesham

शीशम की किशोरियाँ/ sheesham

अच्छा चलिए माना कि आप नव यौवनाओं को आँख उठाकर नहीं देखते, पर यह साल भर साधारण सा खड़ा चामरोद( देसी पापडी) का पेड़ जिसकी ना पत्तियाँ सुघड़ ना तना सुगठित, जो यहाँ वहाँ, जहाँ जगह मिल जाए, अपना डेरा डाल चुपचाप जीवन व्यतीत करता है, इसे तो देखिए. पंद्रह बीस दिनों के लिए ही सही, बसंत इस पर भी आता है. महीन श्वेत पुष्प दलों से इतना लद जाता है कि खुशी को समेट नहीं पाता. पवन के एक झोंके से झर-झर जाता है, मेरे और आपके लिए ज़मीन पर सफेद चादर बिछाता है कि शायद हम बसंत को खोजते हुए उसकी कुटिया पर जाएँ!

देसी पापड़ी की कुटिया

देसी पापड़ी की कुटिया

क्या कहा आपने? आप उन शालीन लोगों में से हैं जो साधारण कुटिया पर नहीं जाते, नवयौवनाओं को नहीं देखते, किंतु मदिरा पान से आपको परहेज़ नहीं. तो चलिए वहीं ढूँढें बसंत को. ये जो सेमल का वृक्ष है, पुरातन पंथी(पर्णी) नहीं. सब कुछ पुराना झाड़ कर खड़ा हो जाता है अपनी सुनियोजित चक्राकार शाखाओं को लेकर. बसंत आता है और हर शाख पर चटख नारंगी लाल मदिरा के प्याले भर जाता है. हाँ! इसके ग्राहक कुछ अधिक ही राह से भटके हुएँ हैं. प्रात:काल प्रभु की बेला में ही पीने चले आते हैं! पर आते सभी है यहाँ- चहकती बुलबुल, घमंडी तोता, झगड़ालु मैना, साधारण बॅबलर, सुसज्जित बरबेट, काला कौआ.

सेमल की मधुशाला

सेमल की मधुशाला

चक्राकार बैठक व्यवस्था

चक्राकार बैठक व्यवस्था

पियक्कड सुबह ही आ पहुंचे

पियक्कड सुबह ही आ पहुंचे

अब जब पी ली है तो आप को ये होंश तो नहीं रहेगा की गुलाबी चुनर ओढ़े इस कचनार की दुल्हन को ना देखें. और ये जो आम का पेड़ है ये तो खुद ही कह रहा है की बसंत क्या आया मैं तो बौरा गया हूँ!

कचनार की दुल्हन

कचनार की दुल्हन

अगर अब भी आप अपनी दर्शनेन्‍द्रियों पर लगाम रखने में सक्षम हैं तो कोई बात नहीं. कामदेव ने ध्वनि बाण भी चलाया है. बुलबुल, दर्जन, बारबेट, प्रिनिया, कोयल, सभी तो उच्च से उच्चतम स्वर में अपनी प्रेयसी को प्रणय निवेदन कर रहे हैं.

सुनो प्रिये!

सुनो प्रिये!

ओहो. तो ये एक हफ़्ता आपको समय ही नहीं था. कोई बात नहीं. बसंत सभी के घर समान समय पर नहीं आता. जबकि सेमल और कचनार से बसंत जाने की तैयारी में है, ज़रुल और ताकोली के पेड़ तो अभी स्वयं को पात्र बनाने में जुटें हैं. निपट शून्यता ही पात्रता है पात्र की. भरे पात्र में कोई क्या पा सकता है? और प्रसाद हो जब कोमल, सुकुमार पर्णीकाओं, रस-रंग-गंध में पगे प्रसूनों और उन पर प्रेम पगे पखेरूँ का, तो कौन अपना पात्र पूर्णत: रिक्त ना करना चाहेगा.

बसंत के आगमन की तैयारी

बसंत के आगमन की तैयारी

हूँ? आपके नज़दीक कोई सेमल, कचनार, पलाश नहीं. पर ये पीपल तो होगा. पीपल के यहाँ तो बसंत बहुत दिन मेहमान बन कर रहता है. धीमे धीमे पुराने पात झड़ेंगे और एक दिन आप देखेंगे की पीपल ने पात्रता पा ली है बसंत को पाने की. फिर कुछ दिन बाद प्रेम की प्रथम कलियाँ फूटेंगी. पर पीपल में कलियाँ? ये कलियाँ नहीं, नव पर्ण के लाज के घूँघट हैं जिन्हे वे अभी हटाने से सकुचाते हैं. जब आप रोज रोज जाएँगे तो एक दिन पाएँगे कि लाज के सभी आवरण हट गये हैं और समूचा वृक्ष कमनीय गुलाबी आभा वाले नवपरणों के साथ तरूणायी मे प्रवेश कर रहा है. इसकी ये रसमसाई, क़समसाई तरूणाई! फ्लवर शो भी फीके लगेंगे आपको जो आपने इसका यूँ धीमे धीमे शबाब पा आना देखा.

पीपल की तरुणाई

पीपल की तरुणाई

घूंघट में छिपे नव पर्ण

घूंघट में छिपे नव पर्ण

ये कोने पर खड़ा बूढ़ा बरगद भी तो कहाँ बसंत से बच पता है. कुछ दिनों के लिए तो यह भी अपनी लाल बेल-बूटों वाली चुनर ओढ़ लेता है.और कहाँ कहाँ नहीं आया है बसंत। पिलखन की तांबई बहार, कोसम की चटख ललाइ, नीम के हमशकल बकैन के भीनी भीनी गंध लुटाते सफेद-गुलाबी फूल, सड़क के किनारे और घास के बीच से सर उठाते छोटे से जंगली फूल, सभी तो बसंत में फूल रहें हैं।
बाहर निकलिए, प्रेम भरी नज़र डालिए, और देखिये.

दहके हैं डाल पर
अंगार या सुमन
सुलगा पलाशवन

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पीला रुमाल बांध गेंदा तो छैला है
सरसों को छेड़ रहा, अलसी तक फैला है
गेहूँ की बाल पर
कसता प्रणय वचन
मन मथ रहा मदन

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मौसम का आम्र मुकुट कलगी है मौरों की
कोयल का सौहर है शहनाई भौरों की
मन की चौपाल पर
यह रूप की दुल्हन
-का प्यार से वरण

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रंगों में सब भीगे तू ही क्यों कोरा है
जो न छुये भीतर तक, फाग वह छिछोरा है

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2 Comments

  1. कवि फूट गया आपके अंदर का जयश्री , पर और सोचता हूँ तो लगता है कि बसंत तो मात्र एक माध्यम है, आप तो किसी भी ऋतू में,इतनी ही तरन्नुम से लिख सकतीं हैं ।

  2. Thanks Nandan.Nature does fascinate me, my surroundings more than any other trip because I observe it everyday… and everyday is a delight because life around me is new in some way.

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