वर्षा ऋतु में राजस्थान, Rajasthan in Monsoon

जी. ये राजस्थान है.

जी. ये राजस्थान है.

राजस्थान का नाम लेते ही जो पहला शब्द ख्याल में आता है वो है रेगिस्तान। रेत के धोरे। रेत के समंदर पर सरपट बहता ऊँटो के जहाज़ का लश्कर। रेत के धोरों पर ऊँट पर सवार ढोला और उसकी मारवण । सूखा। सूखे में भिगोता लांगा और मांगणियार का असीमित गीत-संगीत क्योंकि भीगने भिगाने वाली बूंदों का संगीत तो सीमित है। फिर क्यों कर कोई जाए राजस्थान मानसून में ? किन्तु राजस्थान का सिर्फ एक ही क्षेत्र मरुस्थल है, अन्य क्षेत्र तो सामान्य स्थानों की ही तरह है, न सूखे न अधिक हरे भरे.

वर्षा ऋतु वहीँ अधिक प्रणयशीला लगती है जिसने गर्मी के उत्ताप को सहा हो. राजस्थान में गर्मी की प्रचंडता की बानगी ये है कि सुनसट्ट भी दोपहर की दशा को बयां नहीं करता। आग के गोले बरसाता सूरज, धूल के बवंडर उठाती हवा, न सह सकने पर पुनः ताप लौटाती धरती, जल-विहीन बिसूरते से ताल तलैया, सतत सूखी पत्तियों से ढके प्रांगण में खड़े बेसहाय वृक्ष, और इन सबको देख कर भाँय भाँय करता सन्नाटा। धरती पर पाँव दो तो फफोले उग आये, गरम हवा जो लू लगा के देह को निचोड़ ले, आसमान जो देह का ताप बढ़ा दे, और जल? जल तो खुद ही इन सभी के प्रकोप से अपना आशियाना ही छोड़ दे, अग्नि जो प्रज्जवलित न होकर भी सर्वत्र विद्यमान रहे; जब पंच तत्त्व इतने असंतुलित हो तो जीवन की तो बिसात ही क्या। फिर भी साल दर साल जीवेषणा और जीवटता जीतती है एक आस के सहारे- मेह बरसेगा।

ये भी।

ये भी।

मेह? माने कि वर्षा?? बारिश???

मेह बरसता है गर्मी की अति होने के बाद. धूल भरे बवंडर जो एक दिन अचानक लेकर आते हैं बादलों को. नीचे धूल के गुबार और ऊपर हलके मोटे श्वेत-श्याम बादलों के गुबार। बस गुबार ही रह जाते हैं, बौछार नहीं बन पाते। किन्तु आस जगा जाते हैं. बाट जोहते जोहते एक दिन आता है जब बादलों के सीमान्त पर बिजली भी देव दुंदुभि की तरह उद्घोष करती है, सभी आँखें ऊपर टकटकी लगाए देखती हैं. किन्तु हाय! बिन जल बरसाए ही घनश्याम चले जाते हैं कि प्रेम की प्यास अभी सघन नहीं। कौन उन्हें समझाए कि प्रेम की उष्णता व्यक्त करने को जो नीर नयनो से झरता है, वह तो झरने से पहले ही सूख जाता है.

जाने कैसे फिर एक दिन नयनो के खाली कटोरे देख मेघ भी दयालु हो पड़ते है और अपनी गठरी खोल देते हैं. बूंदे उनके दामन को छोड़ कर कुछ डरी-सहमी सी उतरती है. कुछ तो हवा की हठात गर्मी में ही दम तोड़ देती है. जो नीचे पहुंचती है वो भी महीनों की तपी धरती की आंच सह नहीं पाती; या तो झुलस के मिट जाती है या धरती को छूते ही छिटक कर उछल पड़ती है. इन अग्रिम पंक्ति की बूंदों के बलिदान से हवा और धरती का उबाल कम होता जाता है. तब जाकर बूंदों को जीवनदान मिलता है. कुछ बूँदें इकठ्ठी होकर एक छोटा सा तरल प्रवाह बनाती है. धागे की तरह पतले ये प्रवाह मरू वासियों के लिए जल प्रपात सा आनंद लाते हैं. कई दिशाओं से बहते ये जल प्रवाह मिल कर एक थोड़ा बड़ा प्रवाह, फिर ऐसे कई प्रवाह मिल कर इधर उधर फैलने लगते है माटी की सूख मिटाने को. ज्यों ज्यों सूख मिटती है, त्यों त्यों सौंधी गंध उठती है. आँखों को सहलाती बादलों की छाँव, नासापुटों को छूती सौंधी गंध, देह को शीतल करती ठंडी पवन, कानो में रिमझिम के घुंघरुओं की तान, उस पर वृक्षों पर जमी लम्बी उदासी की धूल और धरित्री के विरह को मिटाता धीमे धीमे छूता हुआ जल राशि का स्नेह स्पर्श। विरही जन के ह्रदय से टीस उठे तो क्या आश्चर्य? सांसारिक प्रेम ही नहीं, भक्त के भाव भी उमड़-घुमड़ आते हैं मन के आसमानी विस्तार में. मीरा ही कहाँ अछूती रह पाई इन बौछारों के बाण से.

“बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की

सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की।
उमड़ घुमड़ चहुँ दिशि से आयो, दामण दमके झड़ लावण की..

नान्हि नन्हि बूंदन मेहा बरसे, सीतल पवन सुहावण की
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, आनंद मंगल गावन की.”

जो बूंदें मीरा को कान्हा की विरह में व्याकुल कर दे, वे क्यूँ कर हमारे ह्रदय में कोंपलें न उमगा दे. तो आइये चलें वर्षा में राजस्थान, ह्रदय की सूखी पड़ी घुमक्कड़ी की कोंपलों को हरा भरा करने।

और ये भी.

और ये भी.

किन्तु कहाँ? राजस्थान तो बहुत बड़ा प्रदेश है. जैसलमेर, जोधपुर, बारमेर और बीकानेर अधिक सूखे क्षेत्र हैं जहाँ मेघ की प्रतीक्षा और मटियाले दामन को साफ़ होता देखना अलग अनुभव देगा। हाड़ोती- कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ जो कि अपेक्षाकृत जल बहुल क्षेत्र है, वहां चम्बल, काली, घग्घर का उफान और इन गिने राजस्थान के जल-प्रपात जैसे कि मेनाल का झरना तथा धान के खेत आपको भुला ही देंगे कि आप राजस्थान में है. राजस्थान का माउंट आबू तो आपको हिमाचली हूक देगा। आबू की नक्की झील में बादलों के आक्रमण में अपनी नौका पर सैर आपको रोमांचित करने में सहायक होगी।

नक्की झील, आबू

नक्की झील, आबू

इन सबके परे है मेवाड़ क्षेत्र। मीरा के प्रेम का आँगन, सिसोदिया राणाओ की वीरता का रणक्षेत्र, और रानियों के जौहर की वेदी। मेवाड़ की धुरी माने उदयपुर तो जाना पहचाना है. बारिश में उदयपुर की छठा ही अलग होती है. लबालब भरी पिछोला झील जो लेक पैलेस, जग मंदिर और नटनी के चबूतरे के ऊपर चढ़ जाने की जिद करे,

पिछोला झील

पिछोला झील

संयम के बंध तोड़ता फ़तेह सागर तालाब जिसे देखने जन सैलाब उमड़ पड़े

जन सैलाब

चारों और हरी भरी अरावली श्रृंखला जो कदमों को ट्रैकिंग पर जाने को ललचाये, गली-चौराहे से उठती पकोड़ों, मालपुओं की भूख जगाती गंध. और हाँ, जहाँ भी आप हों, भुट्टे की सब्जी और उसके साथ घी लगी रोटी जरूर खाइयेगा।

एक और झलक।

एक और झलक।

अगर आप देखें कि उदयरपुर वासियों ने हरे वस्त्र बहुतायत में पहने हैं और बाग़-बगीचों में भीड़ सी है तो जान लीजिये कि ‘हरियाली अमावस’ का त्योंहार है.

फ़तेह सागर

फ़तेह सागर

उदयपुर से जरा बाहर को चलें तो भुट्टे की लहलहाती फसल, कुकुर मुत्ते की तरह उग आये ताल-तलैया आपको बरबस ही जहाँ-तहँ रोक लेंगे।

भुट्टे की फसल

भुट्टे की फसल

अस्तित्व विहीन नदियां भी जन्मती हैं और युवा भी हो जाती हैं. इन नदियों में नहाना एक अलग ही अनुभूति है लेकिन याद रखें, सिर्फ वहीँ नदी में उतरें जहाँ स्थानीय लोग नहा रहें हों.

वर्षा ऋतु का सूर्यास्त

वर्षा ऋतु का सूर्यास्त

रणकपुर जी मंदिर की ओर चलें तो पाएंगे की यह भी एक नदी के किनारे बसा है जो बाकी साल भर सूखी ही रहती है. नदी को निहारकर जब भीतर जाये तो मंदिर प्रांगण में घुस आये बादलों की जिद के सामने झुक जाए.

रणकपुर मंदिर

रणकपुर मंदिर

गर्व से मस्तक उठाये कुम्भलगढ़ के शिखर का भी बादलों में खो जाना और पूरे गढ़ को हरियाली से आच्छादित देखना भी और कभी संभव न होगा।

कुम्भलगढ़

कुम्भलगढ़

हरियाली से आच्छादित कुम्भलगढ़

हरियाली से आच्छादित कुम्भलगढ़

चित्तौडग़ढ़ यूँ तो शौर्य और बलिदान का पर्यायवाची है, किन्तु मीरा का प्रेम भी यहाँ अभी जीवंत है. मीरा के मंदिर में बैठ कर आप बूंदों की तान में मीरा के गान अवश्य ही सुन पाएंगे।

“बादल देख झरी (आंसुओं की धार) हो, श्याम मैं बादल देख झरि.
काली-पिली घटा उमगि, बरस्यो एक धरी
जित जाऊं तित पाणी-पाणी, हुई सब भौम हरी
जा के पिया परदेस बसत है,भींजे बाहर खड़ी.
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर,कीज्यो प्रीत खरी.”

मीरा का प्रेम पूरे मेवाड़ में छलका पड़ा है. और इसीलिए गिरिधर गोपाल की नगरी श्रीनाथजी, चारभुजा जी, और द्वारकाधीश के राजसमंद में वर्षा नहीं प्रेम बरसता है. द्वारकाधीश जी के चरणो को छूती राजसमंद झील भी छलकी जाती है. छलके क्यों न? उसके अधिष्ठाता श्री द्वारकाधीश जी के मंदिर में जन्माष्टमी की झांकी भी तो कान्हा के भक्तों की छलका देती है.

राजसमंद झील

राजसमंद झील

और इन सभी गंतव्यों तक पहुँचाने का जो मार्ग होगा वहां आप राजस्थान के चिर परिचित भूरे मटियाले रंग से नहीं, धरती के पत्थर को चीर कर अपना संक्षिप्त जीवन सम्पूर्णता से जीती कोमल दूब से रूबरू होंगे। जहाँ कभी पानी तो क्या गीली मिट्टी भी न थी, वहां बड़े बड़े ताल भरे दिखेंगे।

हरा ही हरा

हरा ही हरा

ताल - बाघेरी का नाका

ताल – बाघेरी का नाका

और जब यात्रा के दौरान बदरा बरसें, तो बस सब कुछ भूल कर भीग लें. राजस्थान में झमाझम बारिश में भीगने का अनुभव अन्य राज्यों से सर्वथा अलग रहेगा।
तो चलें राजस्थान, और संजो कर लाएं कभी न सूखने वाली भीगी, हरी-भरी यादें।

4 Comments

  1. वाह! आपकी लेखनी ने तो मानसूनी बयार से पूरा भिंगो ही दिया। अपनी राजस्थान यात्रा में मुझे सबसे हरा भरा इलाका उदयपुर का लगा था। कुंभलगढ़ के किले में तो बारिश से सामना भी हुआ था।

  2. राजस्थान का अलग पहलु दिखने के लिए बहुत धन्यवाद

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