रणकपुर की संध्या आरती

दिन भर रणकपुर के मंदिर को निहार कर, थके पैर किन्तु प्रसन्न और शांत मन लिए यात्रीगण, उसके बंद होने के समय अपने अपने वाहनों की ओर चल पड़े. मंदिर में पर्यटकों के लिए देखने का समय दोपहर १२ बजे से सांय ५ बजे तक ही है, ताकि पर्यटकों की चहलकदमी और फोटोग्राफी की हलचल से श्रद्धालुओं की पूजा और भक्तिभाव में विघ्न न पड़े. कुछ ही समय में पूरा मंदिर परिसर खाली और शांत हो गया. दिन भर पर्यटकों की ताक में बैठे बन्दर भी अपना बोरिया बिस्तर बाँध कूद गए. रह गए तो बस निष्चल अंबर तले, अचल पर्वतों के मध्य स्थितप्रज्ञ सा खड़ा मंदिर और उसके अधिष्ठाता भगवान ऋषभ देव (जिन्हे भगवान् आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है) और कुछ श्रद्धालु जिन्हे संध्या आरती में भाग लेना था। आबादी से दूर बसे इस सुरम्य स्थल की एकान्तता अब और मुखरित हो चली. पंछियों के झुण्ड मंदिर के आस पास बने रमणीक घने वृक्षों के कुञ्ज में लौटने लगे. उनका अपना अपना रात्रि व्यतीत करने का स्थान चुनने का कलरव उस एकांत को भरने लगा.

पहाड़ों की गोद में बसा रणकपुर जैन मंदिर, राजस्थान

आरती के लिए पुनः मंदिर में प्रवेश करते वक्त कैमरा और मोबाइल दोनों गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी को दिए और प्रवेश किया। अभी सांझ का दीया जलने में कुछ समय बाकी था. कोई दस-बारह श्रद्धालु रहे होंगे उस समय. भगवान् आदिनाथ जी के सामने बने मंडप में जाकर सभी बैठ गए.

मंडप के ऊपर तोरण।

मंडप के ऊपर तोरण।

संध्याकाल का ये समय मन में कई लहरे उठाता है. यूँ तो दो संध्याकाल है भारतीय मनीषा में- भोर का संध्याकाल जिसमे भोर की ऊर्जा और समय के असीमित फैलाव का आप्लावन होता है. भोर का संध्याकाल हमें संसार में फैलने के लिए ड्योढ़ी से बाहर भेजता है. दूसरा है साँझ का संध्याकाल। मेरी ही तरह आप में से भी कइयों को अपने बचपन की, गांव में बीती गौधूलि वेला याद होगी। लौटते मवेशियों के खुरों से उठती धूल, उनके गले की घंटियों की वातावरण में गूँजती ध्वनि और शाम के चूल्हे का तृप्त करने वाला, नासापुटों में भरता सुगन्धित धुँआ। इस संध्याकाल का परिचय है एक बीता हुआ दिन, जो जीवन की पुस्तक का एक सामान्य पन्ना भी हो सकता है, या फिर एक महत्वपूर्ण अध्याय। आखिर जो भी घटा है, वो किसी एक दिन में तो घटित हुआ.

ऐसा ही ये एक संध्याकाळ था. बीत चुके दिन में मंदिर को निहार लेने का मनोगत संतोष था. चिर परिचित गोधूलि वेला का सा परिवेश न होते हुए भी, उन मवेशियों की ही तरह मन-पशु भी घर लौटने की दिशा में चल पड़ा था. वो घर, जिसे शास्त्र ‘असली घर’ कहते हैं. मन का भी संध्या-काल होता है कभी-कभी, जब मन बाहर की यात्रा करते करते भीतर की याद करने लगता है- अनायास।

मंदिर में पर्यटक

मंदिर में पर्यटक

आकाश में तिमिर के उतरते उतरते ही सम्पूर्ण परिसर में तिमिर उतर आया. मंदिर में बिजली से चलित लाइटों की मनाही होने से प्रकाश-प्रदूषण से विहीन, नितांत चुप्पी साधे इस 1444 स्तम्भों वाले संगमरमर के मंदिर की पवित्र आत्मा प्रकट हो उठी, जो दिन भर तो पर्यटकी के आलोकन-चित्रण में कहीं विलीन रही थी.

पक्षियों का कलरव समाप्त हुआ किन्तु अभी तारा-समूहों ने धरती पर झांकना शुरू न किया. बाहर उस काले-नीले व्योम के असीमित मृदु वरदान में, पारदर्शी पवन के झोंके दिख पड़ने लगे. सद्गुणी रहस्यमयी अँधेरे को पाकर सभी इन्द्रियां शिथिल हो कर बैठने लगी. खुले मंदिर प्रांगण में, खुली हवा ने मन के यहाँ-वहां खुले दरवाजे बंद किये तो गुजरात से आये श्रद्धालुओं ने नवकार मंत्र का सप्रेम उच्चारण आरम्भ किया। सभी कंठ अब एक ही सुर और भाव से उसमे जुड़ गए.

णमो अरिहंताणं-(सभी जीवित सिद्ध मनुष्य को नमस्कार- liberated but living souls, they are yet to leave body)
णमो सिद्धाणं – ( सभी सिद्धों को नमस्कार- liberated souls who have also left their body )
णमो आइरियाणं -(सभी आचार्यों को नमस्कार- preceptors of spirituality)
णमो उवज्झायाणं -(सभी उपाचार्यों को नमस्कार- interpreters of spiritual texts)
णमो लोए सव्व साहूणं। -(सभी साधु-साध्वियों को नमस्कार- all the people on the path of spirituality).##

पुजारी जी ने मंदिर में घी के दीप जलाये। उन दीपों की टिमटिमाती लौ के सामने तिमिर ठहर न सका. आखिर तिमिर का अपना तो कोई अस्तित्व नहीं, वह तो प्रकाश की अनुपस्थिति मात्र है. जीवन के हर पल, हर खाली स्थान और हर खाली घडी को हठात भर देने को आतुर कृत्रिम रोशनी की अनुपस्थिति ने एक भूल सा गया दिव्य रूप प्रकट किया। दीपों की मृदुल, सौम्य और सद्गुणी लौ के प्रकाश ने सभी उपस्थित जनो के रोम-रोम में भगवत प्रकाश भर दिया। भगवान् आदिनाथ की मूर्ति जीवंत हो उठी. मन उन क्षणों में संसार से हटकर प्रेम और वैराग्य के मिश्रित भावों से आपूर हो उठा और कंठो से भगवान के भजन फूट पड़े. बाहर पूर्ण अंधकार और मंदिर में केवल प्रेम से जलते दीपों का अालोक, धरती से अम्बर तक फैली शब्द-शून्यता और मंदिर में बिना किसी साज के ह्रदय से उमड़े भावों का उच्चार, और सभी की आँखे और ह्रदय उस सौम्य, कोमल आलोक में एकटक भगवान आदिनाथ की ओर. रोआँ रोआँ स्पंदित हो उठा. पुजारी जी ने मंदिर का घंट बजाया और भगवान की संध्या आरती आरम्भ हुई.

सोमनाथ की संध्या आरती, उदयपुर के जगदीश मंदिर की संध्या आरती, ओरछा के राम मंदिर की आरती, कई अन्य जैन मंदिरों की आरती मुझे बहुत प्रिय है. किन्तु लाइटों की चकाचौंध में इधर उधर भी मन चला जाता है. किन्तु यहाँ, इस मंदिर की संध्या आरती ने मन को कहीं छुड़ा ही दिया। और न ही बची किसी अनिष्ट निवृत्ति या इष्ट प्राप्ति की कोई तरंग। रहा तो केवल कोरा भगवत प्रेम का भाव.
केवल और केवल मात्र दीपों की कांतिमय रसपूर्ण लौ, और केवल और केवल मात्र कंठों का उच्चार। कितना चिर-परिचित दृश्य है ये हम सबके जीवन का.

मंदिर में फोटोग्राफी की कहानी!

मंदिर में फोटोग्राफी की कहानी!

पुनः कल्पना करिये। गाँव -शहर, कसबे-ढाणी से दूर, बहती नदी के किनारे, पहाड़ों की गोद में बसा संगमरमर से बना ये मंदिर। मंदिर परिसर में सब मिला कर मुश्किल से बीस मनुष्य। गगन से जमीन पर उतरता तिमिर पुंज जिसे हटाने को कोई कृत्रिम लाइट नहीं। उस तिमिर को उतरते देखते आकाशीय पिंड। वन में जब पक्षियों ने भी अपना शब्द छोड़ दिया हो, तब अपने सम्पूर्ण वेग से मंदिर में पसरती यह निशब्दता। मंदिर के सत्व में अपने आपको घोलती ऐसे वातावरण की सात्विकता। और फिर इस निशब्दता में हो भगवत भाव का उच्चार और इस तिमिर को मिटने को हो बस घी के कुछेक दीपों की उज्जवल स्वर्णिम लौ. और उस लौ में आलोकित भगवन आदिनाथ की मूरत। ऐसे रसमयी वातावरण में भीगते,आरती करते श्रद्धालु। मन तरल न हो उठे ये कैसे संभव? और ये आरती एक स्थाई याद और एक मधुर भाव न बन जाये, ये भी कैसे संभव?? और आरती के बाद जब मंदिर से बाहर निकले तो इस अनिर्वचनीय किन्तु नित परिचित, अतुलनीय आनंद को कोई कैसे प्रकट करे? मैं भी नहीं कर पा रही हूँ.

चुप से, अपने आप में स्थित और संतुष्ट हम गाड़ी में जा बैठे, अपने गंतव्य की ओर चल पड़े. दिन भर में देखा मंदिर, उसकी भव्यता, उसकी शिल्प सुंदरता, कुछ भी तो याद न रह सकी इस पवित्र अविस्मरणीय अनुभव के बाद.

जब मनीष ने मंदिर पर पोस्ट लिखी तो मैंने कहा- ” संध्या आरती पर तुम न लिखना, मैं लिखूंगी।”
उन्होंने पूछा-“कब?”
मैंने कोई समय सीमा न बताई।

आज ही लिखी, कई वर्षों बाद. और इन बीते वर्षों में कभी ऐसा नहीं हुआ कि रणकपुर की यात्रा की हो और संध्या आरती बिना किये आये हों. अपितु ऐसा अवश्य हुआ की केवल संध्या आरती के लिए ही रणकपुरजी जाने का कार्यक्रम बनाया गया.

रणकपुर मंदिर पर लेख यहाँ और यहाँ पढ़ें।

## यह मंत्र किसी एक भगवान या तीर्थंकर के लिए नहीं, अपितु समस्त जगत में जितने भी, जिस भी धर्म के- अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाचार्य और साधु-साध्वी हैं, उन सभी को नमन करने के लिए है.

१. रणकपुर उदयपुर-जोधपुर मार्ग पर, उदयपुर से 96 किमी दूर है.
२. रणकपुर में भोजन की व्यवस्था मंदिर परिसर में है. रात्रि भोजन निषेध है.
३. इस मंदिर को आप किसी भी मौसम में देख सकते है क्यूंकि मंदिर में अंदर हमेशा ठंडक ही रहती है.
४. आरती में मंडप में जैन ही बैठ सकते हैं (हालाँकि निजी तौर पर ये मुझे पसंद नहीं, और ऐसा सभी जैन मंदिरों में नहीं होता।), अन्य लोग मंडप के नीचे से देख सकते है लेकिन वस्त्र पूरे पहने हों. शार्ट, कैप्री आदि वर्जित है. वहां से भी पूरी आरती दिखती है.

13 Comments

    1. Anupam dada,
      You can attend the aarti from below the main mandap if you are non-jains, and I really feel uncomfortable about this. It is not like that in every jain temple though. Still, I would recommend it any day to participate in evening aarti to feel that atmosphere. Do take care to be clothed fully- no shorts, no three-fourth pants.

  1. निशब्द हूँ आपके शब्दों को पढ़कर जी…..
    मैने रणकपुर का यह भव्य मंदिर अभी इसी वर्ष ही तो देखा है, और बस देखता ही रह गया था हालाँकि मुझ में श्रद्धा केवल मंदिरों की भव्य भवन निर्माण शैली की तरफ ही होती है….यदि औरंगजेब द्वारा इस मंदिर को तोड़ा ना गया होता, तो इस मंदिर की असली व पहली भव्यता कितनी अधिक होती….. मैं भी शाम को ही मंदिर देखने पहुँचा था, पर मंदिर बंद होते ही बाहर निकल आया, यदि मालूम होता संध्या आरती के विषय में तो अवश्य वहाँ रुक जाता।

    1. विकास जी,
      औरंगजेब द्वारा इस मंदिर को तोड़ने का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. हाँ, सामरिक उथल-पुथल के चलते इस मंदिर को छोड़ दिया गया था और फिर डाकुओं और अनेक असामाजिक तत्वों ने इसे अपना डेरा बना लिया था. फिर बीसवीं सदी में आनंद जी कल्याण जी ट्रस्ट द्वारा इसका जीर्णोद्धार करवाया गया और १९५३ में पुनः इसे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया.
      मैं मंदिर में अवश्य दोनों भाव से जाती हूँ, लेकिन हर मंदिर का अलग वातावरण होता है. इस मंदिर की आरती क्यूंकि एकदम प्राकृतिक वातावरण में , सिर्फ दीपक की लौ में होती है इसलिए मन को बहुत छूती है.

  2. अद्भुत !
    इस मंदिर के बारे में मुझे गूगल से मिली, दरअसल ओरछा के एक भव्य होटल ओरछा पैलेस की लॉबी के गुम्बद की कलाकारी देखकर जिज्ञासा हुई कि देश मे इतनी अच्छा शिल्प कहाँ पर है ? कुछ लोगो ने इसे दिलवाड़ा के मंदिरों की कलाकारी कही तो कुछ ने कुछ और …खैर गूगल पर खोजते हुए यहां पहुँच ही गया । आज आपकी पोस्ट से भी कई नई जानकारियां मिली । हार्दिक आभार

    1. धन्यवाद मुकेश जी,
      कला-शिल्प की दृष्टि से दिलवारा के मंदिर का कोई सानी नहीं। लिखती हु शीघ्र ही उसके बारे में.

  3. आप के साथ इस धरोहर के दर्शन हमें भी हो गये।
    कभी साक्षात भी देखेंगे।
    आज के लेख के कुछ शब्द तो बहुत से दोस्तों को डिक्शनरी में तलाश करने पड सकते है।

    1. धन्यवाद संदीप जी.
      अँधेरा एक नकारात्मक शब्द बन गया है, इसलिए तिमिर शब्द का प्रयोग किया। आगे से ध्यान रखूंगी शब्दों के चयन का, हालाँकि लेखन की अपनी एक शैली होती है. सुझाव के लिए धन्यवाद।

  4. बहुत ही सजीव वर्णन , राजस्थान पर्यटन निगम को अपने भावातीत में इस लेख का उल्लेख करना चाहिए , कभी कभी शब्द वर्णनं नहीं कर पाते आपकी भावनाओ को, शायद यहाँ ऐसा ही कुछ हो रहा है . आपकी कलम को और ताक़त, आपके mastercard को और ताकत जो की आप सुदूर प्रान्तों का भ्रमण कर पाए और हम जैसे गौण लोगो का भी ज्ञान संवर्धन हो सके

    1. हार्दिक आभार इतने खुले दिल से प्रशंसा करने के लिए. आप गौण होते तो इस लेख को पसंद ही नहीं करते, क्योंकि ये लेख एक अनुभव को शब्द देने की कोशिश है, उस जगह को नहीं।

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