महाबलीपुरम का ‘कला-ऐतिहासिक’ महत्व

चेन्नई से 60 km दूर स्थित है महाबलीपुरम, जिसे माम्मलपुरम के नाम से भी जाना जाता है. चेन्नई से पॉन्डिचेरी जाते वक्त यह रास्ते में पड़ता है. बंगलोर और चेन्नई से इसे और पॉन्डिचेरी दोनों को वीकेंड गेटअवे की तरह घूमा जाता है. बहुत से पर्यटक इसे ‘उतना अच्छा नहीं है’, इससे तो अ ,ब,स, मंदिर ज्यादा अच्छे हैं, कह कर चल देते हैं या फिर इस पर नाना प्रकार की भाव भंगिमाओं में फोटो खींचने में ही इसको सराहते हैं.

पर्यटकों का इसमें कोई दोष नहीं। हमारी शिक्षा प्रणाली में हमें अपनी ही धरोहर की समझ नहीं दी जाती है. हमें अपने मंदिरों की स्थापत्य कला के बारे में पता नहीं, हमें अपने शिल्प वैभव को कला दृष्टि से देखना नहीं सिखाया गया कभी. यहाँ तक कि हम तो शिव, विष्णु के अनेक रूपों को भी नहीं पहचान पाते।
कला के नाम पर हमें सिखाया गया आम, मोर, तिरंगा और एक सीनरी बनाना। सीनरी, जिसमे हम सभी दो तीन समोसे जैसे पहाड़ बनाते थे, उनके बीच में एक सूरज, एक नदी और बहुत हुआ तो नदी के एक तरफ झोपडी और एक तरफ लॉलीपॉप जैसा पेड़.
इतिहास में प्राचीन और मध्य भारत का हिस्सा बहुत शीघ्रता से निबटा दिया जाता था और उसमे भी दक्षिण भारत का इतिहास तो बहुत ही कम होता था.
कला और इतिहास का ये हाल था, तो कला-इतिहास जैसा विषय तो हमने सुना ही नहीं कभी, जिसमे कला को इतिहास के सन्दर्भ में और इतिहास को कला में देखा-ढूंढा जाता है.

The five-Rathas group, Mamallapuram

यही कारण है कि हम महाबलीपुरम को फोटोशूट की जगह मानते हैं बस, जबकि classical Indian monuments में इसका जो महत्व है उसे ही नहीं जान पाते।

(नोट- इस लेख का दायरा सिर्फ महाबलीपुरम के स्मारकों का कला और इतिहास के सन्दर्भ में क्या महत्व है, वहीँ तक सीमित है. अतः ये लेख न तो पल्लव वंश का और न ही महाबलीपुरम का ऐतिहासिक चिटठा रखता है. कला को भी विस्तृत रूप से नहीं देखता है. इस लेख का आशय सिर्फ ये जानने में है कि महाबलीपुरम की हमारे कला-इतिहास में क्यों इतनी महत्ता है.)

महाबलीपुरम के सभी स्मारक पल्लव वंश के शासकों द्वारा बनवाये गए थे, जिनकी सत्ता शुरू हुई लगभग तीसरी-चौंथी ईस्वी सदी में, और कांचीपुरम जिनकी राजधानी रही. पल्लवों ने 400 वर्षों तक इस भूभाग पर राज्य किया और उसके बाद तंजावुर के चोला वंश ने इनको हराकर इसे अपने राज्य का भाग बनाया।

महाबलीपुरम के प्राचीन स्मारकों को हम तीन ग्रुप में रख सकते है:
रॉक-cut मंदिर और एकल शिल्प-पैनल।
एक चट्टान से बने मंदिर, जो रथ के नाम से ख्यात हैं
शोर टेम्पल, समुद्र के किनारे बना मंदिर।

सबसे प्राचीन रॉक-कट गुफा-मंदिर गया के नज़दीक बाराबार में हैं, जो मौर्य काल में 322- 185 BCE में बने। इसके बाद के अनेकों रॉक-कट गुफा-मंदिर सम्पूर्ण भारत में मिलते हैं, जिनमे अजंता, एल्लोरा, एलीफैंटा आदि बहुत ही प्रसिद्ध हैं. महाबलीपुरम के रॉक कट गुफाये वैसी प्रसिद्ध नहीं।

लेकिन जो महाबलीपुरम में है, वो सम्पूर्ण भारत के कला-क्षेत्र में और नहीं। चट्टान पर शिल्प जो किसी गुफा या मंदिर का भाग नहीं, स्वतंत्र रूप से अपने आप में ही पूर्ण है. पहले इसे ‘भागीरथ की तपस्या’ समझा जाता था लेकिन अब कला-इतिहासविद इसे ‘अर्जुन की तपस्या’ पैनल के रूप में व्याख्यित करते हैं.

The free-standing panel of Arjuna’s penance

इसे ‘अर्जुन की तपस्या’ का निरूपण समझने के पक्ष में निम्न प्रमाण दिए जाते हैं-
1). अगर इसे भागीरथ की तपस्या का शिल्प समझे तो इस पैनल में कृशकाय हुआ तपस्वी भगीरथ होना चाहिए। तब उसे पैनल में बनी मंदिर की शिल्प में भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। लेकिन पैनल में दर्शाये मंदिर के देव निश्चित रूप से श्री अच्युत हैं, जो कृष्ण का एक नाम है. अब ये ‘नर और नारायण ‘ की उस कहानी पर बना लगता है, जिसमें अर्जुन पूर्व जन्म में नर तथा कृष्ण नारायण थे, और दोनों ने बद्रिका में तपस्या की थी.

2. बहुत से कला-इतिहासविद इस पैनल को छटी सदी के लेखक भारवि कृत प्राचीन साहित्य ‘किरतअर्जुनियम’ का शिल्प निरूपण मानते हैं. यह कृति महाभारत के वनपर्व में लिखित अर्जुन की पशुपतास्त्र प्राप्त करने की कथा पर रचित है. इसमें अर्जुन भगवान् शिव से पशुपति अस्त्र प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या करता है. भारवि ने अपनी कृति इसी कथा पर लिखी थी और इसमें कुछ अंश और जोड़े थे, जिसमे से एक परिवर्धन ‘नर और नारायण’ की कथा है.

Arjuna’s Penance Panel, Mahabalipuram

दर्शक के लिए इस पैनल को सराहने के लिए लेकिन ये इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि ये अर्जुन की तपस्या है या भगीरथ की. मामल्ला शिल्पी की कला पूरे भारत में अद्वितीय है. यहाँ शिल्पी ने मनुष्य और पशु दोनों को ही असलकद में बनाया है जो और कहीं देखने को नहीं मिलता। इस पैनल के हाथी तो हर तरह से अनन्य हैं- पूर्णतः असल कद में, विभिन्न भाव में, वयस्क और शिशु हाथी, खेलते, दौड़ते, उठते-बैठते और चिंघाड़ते।

Elephants in various pose, ‘Arjuna’s Penance’ panel, Mahabalipuram

कृशकाय अर्जुन और वरदान देते हुए शिव का सशक्त, प्रभावी शिल्प हमें शिल्पकार की बहुमुखी प्रतिभा से जीवित परिचय करवाता है.
लेकिन इन सबसे अधिक आश्चर्य है शिल्प के लिए साहित्यिक कृति का चयन.

एक और रॉक-कट पैनल है कृष्ण-मंडप, जिसमे कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठा लेने की घटना को दर्शाया गया है. इस पैनल को सम्पूर्ण भारतीय शिल्प कला में कृष्ण के गोवर्धन गिरिधारी रूप का सर्वश्रेष्ठ शिल्प माना जाता है.

Krishna as Govardhan Giridhari

दूसरा ग्रुप है स्वतन्त्र रूप से एक ही शिला को काट कर बनाये गए पूर्ण मंदिर।

भारत में लगभग 1500 ज्ञात रॉक-कट गुफाये और विहार है, जिनमे अजंता, एल्लोरा आदि जग प्रसिद्ध है. लेकिन बात जब रॉक-कट पूर्ण मंदिरों की आती है तो एक हाथ की अँगुलियों पर इनकी संख्या गिनी जा सकती है. ये हैं-
महाबलीपुरम के रॉक-कट मंदिर, जिन्हे रथ के नाम से जानते हैं.
एल्लोरा का कैलाश मंदिर, और
मसरूर, हिमाचल के रॉक-कट मंदिर।

मसरूर के मंदिर के निर्माण काल सुनिश्चित तौर पर ज्ञात नहीं है. छठी से आठवीं सदी के बीच में कभी बने होंगे, लेकिन अधिकांश इतिहासविद अनेक कारणों से इन्हे 8वीं सदी में निर्मित हुआ मानते है, जिनका विवेचन फिलहाल इस लेख को विषयांतर का दोषी बना देगा।
एल्लोरा का कैलाश मंदिर राजा कृष्णा I के शासन काल में हुआ था यानि A.D. 756-783 में कभी.
ASI के अनुसार महाबलीपुरम के रथ-मंदिरों का निर्माण पल्लव राजा नरसिंहवर्मन I ने करवाया था जिसका शासनकाल था AD 630-668.

इस तरह से महाबलीपुरम के रथ-मंदिर, वर्तमान में विद्यमान, भारत के सबसे प्राचीन रॉक-कट पूर्ण मंदिर हैं.

अगर हम स्थापत्य की बात करें तो रथ-मंदिर द्रविड़ शैली के सबसे प्राचीन प्रारूप है जिन पर आगे चल दक्षिण के भव्य मंदिर बने.
कैलाश मंदिर पर द्रविड़ प्रभाव है जरूर, लेकिन पूर्णतः द्रविड़ शैली में नहीं बना है.
मसरूर के मंदिर तो उत्तर भारतीय शैली में हैं ही.

Evolution from thatched roof , single tiered, double tiered and three tired Vimana

Single tiered, barrel vaulted roofed Bhima Ratha

Three tiered vimana of Dharmraj Ratha

अब बात करें शोर टेम्पल के नाम से ख्यात समुद्र किनारे बने शिव मंदिर की.

The shore-temple, Mahabalipuram

भारत के कला-इतिहास में इसका अत्यंत महत्व है क्योंकि ये भारत का सबसे प्राचीन पत्थर का बना भव्य विमान वाला मंदिर है.
पांचवीं सदी में बना ऐहोल, कर्नाटक का लाडखा मंदिर यूँ तो भारत का सबसे प्राचीन पत्थर का बना मंदिर है. इसके बाद आता है ऐहोल का ही दुर्गा मंदिर। ये दोनों ही मंदिर छोटे हैं और इनका स्थापत्य पत्थर से मंदिर बनाने की हमारे पूर्वजों के आरम्भिक प्रयत्नों को दर्शाता है. इसीलिए इनमे ऊँचे विमान, पृथक मंडप या गोपुरम जैसे स्थापत्य के सोपानों का अभाव है. इससे पहले हम काष्ट, मिटटी, और फिर चट्टानों को काट कर गुफा-मंदिर व् पूर्ण मंदिर बना रहे थे.

शोर-टेम्पल का निर्माण राजा राजसिम्हा नरसिंहवर्मन II के शासन काल में हुआ था यानि 700-728 AD के मध्य कभी.

ज्ञात रहे कि :
पुरी के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण हुआ 11-12वीं CE में,
कोणार्क का सूर्य मंदिर बना 13वीं CE में,
खजुराहो के मंदिर बने 10वीं से 12वीं CE में,
आज जो हम मदुरै का मंदिर देखते है, वह पुनर्निर्मित हुआ था 15वीं -16वीं CE में, मलिक काफ़ूर के इसको 14 वीं सदी में ध्वस्त करने के बाद,
हम्पी, कर्नाटक के विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण काल लम्बा है- 7वीं सदी में एक छोटे से देवालय के रूप में शुरू हुआ ये मंदिर कई बदलाव से गुजरा होयसाला, चालुक्य और फिर अंत में विजयनगर राज्यवंश के दौरान। आज जो रूप हम देखते है वह मुख्यतः विजयनगर शासकों की देन है.

Sangmeswar temple, Pattadakal, Karnataka

पत्तदकल, कर्नाटक के मंदिर ‘शोर-टेम्पल’ की समय सीमा में बने जैसे कि संगमेश्वर मंदिर जिसका निर्माण विजयादित्य सत्याश्रय ने A.D. 720 में आरम्भ किया। किन्तु ये किसी भी तरह से ‘शोर-टेम्पल’ के आयाम, विमान और स्थापत्य को छू नहीं पाता. आज जो संमेश्वर मंदिर हम देखते हैं, उसमे मंडप बाद में जोड़ा गया है.

The Shore-temple, Mahabalipuram

अतः महाबलीपुरम का शोर टेम्पल सबसे प्राचीन मौजूदा मंदिर है जो कि मात्र आरम्भिक प्रयोग नहीं अपितु एक सुविकसित स्थापत्य कला का उदाहरण है.

इस तरह से अर्जुन की तपस्या व् कृष्ण-मंडप पैनल, रॉक-कट रथ मंदिर तथा समुद्र किनारे बना शोर-टेम्पल नाम से ख्यात मंदिर हमारे कला-इतिहास की अमूल्य, बेजोड़ धरोहर है जिनका कोई सानी नहीं।

यात्रा बिंदु:

चेन्नई से यहाँ पहुँचने के लिए बहुत अच्छी बस सेवा उपलब्ध है. चेन्नई में CMBT, कोयम्बेडु से आप यहाँ के लिए बस ले सकते हैं.
ठहरने के लिए सभी बजट के होटल उपलब्ध हैं.
चेन्नई की ही तरह यहाँ भी मौसम बड़ा उमस और गर्मी वाला होता है. अतः सर्दी में घूमना ठीक है.

2 Comments

  1. आपने हिमाचल प्रदेश के चट्टान मंदिर मसरूर के बारे में भी कहा है जी, इस मंदिर को निर्माण शैली देखने पर यह शिव मंदिर प्रतीत होता है, परन्तु इस मंदिर में अभी भगवान राम, सीता व लक्ष्मण की मूर्तियाँ स्थापित है।

  2. जयश्री जी जितना आपने लिखा उतना मुझे सच मे शिल्प कला की समझ नही है में अभी 14 अगस्त को महाबलीपुरम जाकर आया लेकिन सच कह ज्यादा न detail में गए क्योकि आपके जैसी नजर नही है…बहुत सही और बढ़िया विवरण और हा हमारी शिक्षण प्रणाली में ही दोष है जी…

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