वरकला: पारम्परिक नाव और मछुआरे

Odayam Beach, Varkala, Kerala

यह वरकला के ओडायम बीच पर हमारा दूसरा दिन था. सुबह से हम मछुआरों को उनकी पारंपरिक नाव जिसे catamaram कहते हैं, को लेकर समुद्र में मछली पकड़ने जाते हुए देख रहे थे. हम उनके साथ उनकी सरल सी नाव पर समुद्र की सैर को जाना चाहते थे लेकिन इस समय समुद्र थोड़ा अशांत था इसलिए नहीं जा पाए. सुबह काफी देर तक मछलियां पकड़ने के बाद दोपहर में मछुआरे कुछ देर के लिए सुस्ताने छाया में बैठे। बीच पर हमारे और एक ओमान से आये परिवार के अलावा और कोई ना था. सब कुछ शांत था केवल समुद्र को छोड़ कर. यदा-कदा कोई ब्राह्मणी चील उड़ती दिखाई दे जाती थी. हम भी बीच छोड़ कर नारियल के पेड़ की छांव तले जा बैठे। तभी अचानक मछुआरों की अप्रत्याशित हरकत और शोर गुल ने हमें भी अपने पर धुप से छाई ऊंघ से जगा दिया। सभी मछुआरे एक एक कर अपनी नौका तैयार कर धकेलने लगे. मन में एक धक्का से लगा – क्या कोई डूब रहा है? किसी के डूबने पर बचाने की आवाज़ हमें आई नहीं थी. कोई दिख भी नहीं रहा था लेकिन हमें क्या पता चल सकता था. हमारी आंखें तो समुद्र को पहचानने की अभ्यस्त थी नहीं।

होटल मालिक से चिंतित स्वर में पूछा, ” क्या हुआ? कोई डूब रहा है क्या?”

उसके चेहरे पर हमारी नौसिखियाई पर थोड़ी मुस्कुराहट उभर आई जिसे दबाते हुए उसने कहा-“वह देखिए। दूर समुद्र में आपको थोड़ा अलग सा रंग दिख रहा है?” और अंगुली से इशारा किया। हमने जब उस तरफ देखा तो वाकई में समुद्र में एक हिस्से में रंग अलग सा हो रहा था.

“एक बहुत बड़ा मछलियों का समूह (fish shoal) वहां उस तरफ आया है जिस कारण पानी का रंग बदल गया है. मछुआरे उसी को पकड़ने वहां दौड़ पड़े हैं. समुद्र के बदलते रंग को देखकर मछलियों का अंदाजा लगाना भी अनेक तकनीकों से में से एक है जिससे मछुआरे मछलियों के होने का समुद्र में पता लगाते हैं.”

हमने चैन की सांस ली! अब आप भी हमारी अज्ञानता पर मुस्करा रहे हैं?
सोचिये! भला एक राजस्थानी को मछुआरों और मछली पकड़ने की किसी बात का क्या ज्ञान हो सकता है?
हो सकता है, यदि आप ओडायम बीच, वरकला की सैर को जाएं!!

***

हम वरकला के ओडायम बीच पर अक्टूबर 2014 की एक सुनसान दोपहरी को पहुंचे थे दिल्ली से. सूरज बहुत तीव्र था और तापमान बढ़ाने पर तुला था. समुद्र भी उसका साथ ही दे रहा था उमस बढाकर। और जगहों की तरह यहाँ कुत्तों की फ़ौज हमारा स्वागत करने को न थी. बिल्लियां थी मगर वे दूर से ही अपनी चालाक आँखों से हमें नाप तौल रही थीं. ऊपर कुछ ब्राह्मणी चील उड़ रही थी जिनका कत्थई तांबई भूरा रंग और सफेद वक्ष आसमान और समुद्र दोनों के नीले रंग में कुछ अलग प्रभाव देने की सार्थक चेष्टा कर रहा था. कौवे भी शांत होकर नारियल के पेड़ों पर जमे बैठे थे. जब हमारी कार बीच पर बने होटल के बाहर पहुंची तो होटल से भागकर एक आदमी हमारे पास पहुंचा। जब तक हम उससे कुछ बात करते और कहते या सामान निकालते बच्चे जूतों समेत समुद्र की ओर दौड़ गए. समुद्र ने भी नानी-दादी की तरह उन्हें अपने आँचल में समेट प्रेम से भिगो दिया। तुरंत लौट कर आए और अब जबकि जूते-मोज़े रेत-पानी से भर गए, जल्दी से उन्हें खोलकर फिर दौड़ गए. सामान निकालने से पहले उन गीले रेत से भरे जूतों को संभालना पड़ा। उससे भी बुरी बात- वे तो डांट सुनने के लिए भी नहीं रुके।

होटल के मालिक ने जोर से आवाज देकर कहा- ” ज्यादा गहरे में ना जाना! अभी इस समय समुद्र तेज है.”

बीच के किनारे नारियल के पेड़ के तले लगी सुंदर सी लकड़ी की टेबल पर अपनी वेलकम ड्रिंक लेकर जब हम बैठे तो आंखें सबसे पहले लहरों से टकराती हुई दूर क्षितिज की ओर जाकर टिकी किंतु बहुत जल्द ही समुद्र के साथ पुनः लौट कर रेतीले समुद्र तट का मुआयना करने लगी. नारियल के बड़े-बड़े पत्तों की सरसराहट सुन कर आखें उनकी ओर मुड़ी किंतु फिर से धूप में चमचमाती रेत पर जा टिकी। कुछ लकड़ी और कुछ नाव जैसा दिख रहा था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कोई नाव ऐसी कैसे हो सकती है. पास जाकर देखा तो उस पर बंधे मछली के जाल को देखकर निश्चित हो गया कि मछुआरों की मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने वाली नाव है. नाव क्या थी बस तीन मोठे लट्ठ थे जिन्हे नारियल से बनी रस्सी से साथ बांध दिया गया था. जब पहली दफे टोकरीनुमा नाव देखी थी विस्मय तब भी हुआ था लेकिन ये नाव तो और भी चकित कर देने वाली थी. सोचा कि नदी, झील और ताल-तलैया पर तो ठीक होगी लेकिन इस पर बैठ समुद्र में कैसे जाया जा सकता है? और वो भी मछली पकड़ने को? देखने को मन उतावला सा हुआ.

Fishermen arrive to take catamaran to sea.

अधिक समय तक इंतजार न करना पड़ा। चेक प्रिंट के लूंगी नुमा वस्त्र पहने खुले बदन, जो कि धूप से तपकर गहरा हो गया था, मछुआरे आ गए. जोर शोर से उनकी आपस में बातें होने लगी लेकिन एक भी शब्द समझ ना आया. उनके हाथों के इशारे से यह तो समझ आया कि अब यह मछली पकड़ने को जाने वाले हैं. कुछ ही देर में एक मछुआरे ने उस नाव को पानी में धकेलना शुरू किया जैसे ही नाव तट को छोड़कर पानी में पहुंची दूसरा मछुआरा कूद कर उस पर बैठ गया. इतने में ही सामने से एक ऊंची लहर आई और मछुआरे ने बांस से बने पतवार को हाथ में लेकर उस उस लहर का बड़ी फुर्ती से सामना किया। उनके हाथों और कन्धों की मासपेशियां धूप में चमकती हुई हरकत में आई. नाव ऊपर को उठी और फिर धड़ाम से नीचे को गिरी। दिल भी मेरा उतना ही तेजी से ऊपर उठा और नीचे गिरा। किन्तु मछुवारे को कुछ फर्क नहीं पड़ा। वह अपनी पतवार थामे निश्चिन्त होकर बढ़ चला. हमारी आंखें उसे तब तक देखती रही जब तक की आंखों से ओझल ना हो गया.

Getting into the sea and jumping on the Catamaran

Facing the oncoming surf

अब तक दूसरी catamaran भी तैयार हो चुकी थी पानी में जाने को. इस बार दोनों मछुआरे लपककर उस पर बैठ गए और वे भी अपनी पतवार थाम कर चल पड़े समुद्र की ओर.

Second Catamaran getting ready

Traditional Fishing Boats in Kerala
ये मछुआरे जिन नावों को लेकर मछली पकड़ने समुद्र में गए, उसे पारंपरिक तौर पर catamaran कहते हैं. Catamaran शब्द तमिल शब्द ‘कटु-मारन’ से बना है जिसका सीधा अर्थ है जुड़ी लकड़ियां। इस तरह की नाव पेड़ के तीन मोटे तनो को थोड़ा सा गोलाई में घिस कर, आपस में नारियल के सूत से बांधकर बनाई जाती है. इन तीन लट्ठों वाली नाव पर एक या दो व्यक्ति ही बैठ सकते हैं. कुछ नावे 4-5 लट्ठों को मिलाकर भी बनाई जाती है जो कि 4 व्यक्तियों को ले जा सकती है.

Getting into sea

लक्कड़ के बीच में जो खाली स्थान रहता है उसे किसी से भरा नहीं जाता ताकि समुद्र का पानी उसमें से निकलता रहे. इस तरह की नाव मछुआरों को सिर्फ पानी के ऊपर तैरते रहने में मदद करने के लिए ही काम में ली जाती है ताकि वह उसके ऊपर बैठे हुए जाल फेंक पर मछलियां पकड़ सके. पकड़ी हुई मछलियां जाल में लगी हुई ही रहते हुए जाल को पुनः इसी नाव पर लाद कर मछुआरे लौटते हैं. तट पर पहुंचकर जाल में से उन मछलियों को हाथ से छुड़ाकर निकाला जाता है.
यह साधारण से दिखने वाली सिर्फ लकड़ी के तनों से बनी नाव बहुत ही दक्षता से ऊंची लहरों का सामना करती हैं और छिछले पानी में भी ठीक से तैर पाती है.

Jumping on to boat

मछुआरे अलग अलग तरह की मछलियों को पकड़ने के लिए अलग-अलग तरह के जाल काम में लेते हैं. केरल में मलयाली में उनके नाम कुछ इस तरह से हैं-
Iletholi vala (anchovy net)
chaJa vala (sardine net)
konju vala (prawn net)
valai madi (ribbon-fish seine) .

Facing the surf

भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर नाव डिजाइन का इतिहास:
पारंपरिक तौर पर समुद्र तटों पर नाव वहां के भौगोलिक और सतही गुणों के हिसाब से तथा समुद्र में मछलियों की उपलब्धता के हिसाब से विकसित हुई. इसके अलावा सदियों के सांस्कृतिक प्रभावों के हिसाब से अलग-अलग क्षेत्र की नाव अलग-अलग तरह से विकसित हुई.

Afternoon break at Odayam Beach

गुजरात और महाराष्ट्र की coastal line भारत की नार्थ वेस्ट कोस्ट कहलाती है. इस कॉस्ट लाइन पर 2000 ईसापूर्व भी फारस की खाड़ी के लोगों के साथ व्यापारिक संबंध थे. इस वजह से यहां की नावों में अरब प्रभाव स्पष्ट रुप से दिखाई देता है. मालिया, होदी, मच्छवा आदि यहां की परंपरागत नावे हैं जिन पर स्पष्ट अरब प्रभाव दिखाई देता है.
यहां समुद्र में मछलियों की प्रचुरता केरल के मालाबार कोस्ट जैसी नहीं है और ना ही यहां पर लोग (तटीय इलाकों के आलावा) अधिक मछली का प्रयोग करते हैं फिर भी यहां की परंपरागत मछली पकड़ने वाली सामुद्रिक नावे बड़ी होती हैं. इस असंगति का कारण है कि यहां के पानी में मौसम विशेष में ही मछली पकड़ने का व्यवसाय लाभदायक है. बाकी समय इन नावों से सामान व यात्रियों को लाने ले जाने का काम किया जाता था इसलिए यह नावे आकार में बड़ी हैं हालांकि मछली उत्पादन अधिक नहीं।

Returning with the catch

भारत का कोंकण और मालाबार कोस्ट, साउथ वेस्ट कोस्ट के नाम से जाना जाता है. कोंकण कोस्ट में महाराष्ट्र और गोवा आते हैं. कुछ भाग कर्नाटक राज्य का भी इसमें आता है. मालाबार कोस्ट केरल की कोस्ट लाइन है.
महाराष्ट्र की नावें काफी कुछ गुजरात की तरह ही है लेकिन गोवा की नावें कुछ भिन्न होती है. गोवा की परंपरागत नावों में लकड़ी के तने को खोखला (dugout canoe) कर आधार बनाया जाता है. फिर उसके दोनों और लकड़ी के पट्टे जोड़-जोड़ कर उसे बड़ा करते हैं. नाव में बाहर केवल एक कोने से जोड़ा गया लकड़ी का पट्टा, जिसे outrigger कहते हैं, गोवा की पारम्परिक नावों को बाकि क्षेत्रों से अलग करता है. कर्नाटक की परंपरागत नावे भी लकड़ी के तने को खोखला कर बनाई गई नावे हैं.

केरल परंपरागत देसी नाव के मामले में सबसे अधिक वैरायटी दिखाता है. यहां पर उपलब्ध परंपरागत नावे तीन प्रकार की हैं:
1. Dugout canoe
यह पेड़ों के बड़े तने को बीच में से खाली कर बनाई जाती हैं. यह तीन आकारों में उपलब्ध हैं- बड़ी, मध्यम और छोटी। बड़ी नावों को odam, मध्यम को thoni और छोटी नावों को नामों को Bepu Thoni कहते हैं.

2) Plank built canoes
लकड़ी के पट्टों को जोड़ कर बनाई जाने वाली नावे स्थानीय रूप से वल्लम कहलाती है. इन पट्टों को नारियल के जूट से सिलकर जोड़ा जाता है इन्हें ज्यादातर पतवार से ही चलाया जाता है.

3) Raft Catamaram
इस तरह की नावे सबसे अलग है. इन्हें लकड़ी के तीन से पांच तनों को इकट्ठा बांधकर बनाया जाता है. बांधने के लिए वही नारियल की बनी रस्सी काम में ली जाती है. तनो को थोड़ा घिसकर मनचाहा आकार दे दिया जाता है. एक तरफ से हल्की सी उठी हुई और पतली और पीछे से थोड़ी दबी और चौड़ी यह नावे आश्चर्यचकित करती हैं और मंत्रमुग्ध भी. तीन तनों को जोड़कर बनाए जाने वाली नाव पर एक या दो लोग मछली पकड़ने के लिए जा सकते हैं जबकि पांच तनों को जोड़कर जो थोड़ी बड़ी नाव बनती है उसमें तीन चार लोग भी बैठ सकते हैं. लकड़ी के बीच में जो जगह छूट जाती है उसे किसी से भरते नहीं ताकि समुद्र का पानी उसमें से निकलता रहे. एक तरह से यह नाव मछुआरों को पानी के ऊपर तैरते रहने के लिए प्लेटफार्म देने के काम आती है. इस तरह की नाव लेकर मछुआरे समुद्र में बहुत अधिक दूर नहीं जाते लेकिन उसकी उन्हें मालाबार कोस्ट पर आवश्यकता भी नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के पानी में मछलियां प्रचुरता से उपलब्ध है अतः जाकर एक-दो घंटे मछली पकड़ कर आने में ही उनका काम हो जाता है.

Hauling the catamaran to the shore with catch

Lifting the Catamaran to the beach

इस मालाबार क्षेत्र के भी मिस्र, सीरिया, अरब, रोम और चीन के साथ गहरे व्यापारिक संबंध थे लेकिन फिर भी क्षेत्र की परंपरागत नावो पर अरब प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। यहां तक की अरब के बाहर नाव् की सुधार, रखरखाव और देख रेख के लिए जो सबसे बड़ा केंद्र था वह मालाबार में Beypore में ही था. आज भी मालाबार में Beypore में अरब डिज़ाइन को नावे बनती है, जिन्हे ऊरु कहते हैं, और अरब देशों को निर्यात होती हैं. किंतु फिर भी मछुआरों की परंपरागत नावों में ये अरब प्रभाव नहीं पड़ा. यहां पर मालाबार में रहने वाले लोग इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो गए, गुजरात में नाव पर अरब का प्रभाव आया लेकिन मालाबार की परंपरागत नावे वैसी की वैसी ही रही.

इसके दो मुख्य कारण हैं- पहला केरल की कॉस्ट लाइन और उसके अंदर के क्षेत्रों में बड़े बड़े वृक्षों का आसानी से और बहुतायत में उपलब्ध होना। इस वजह से बड़े लकड़ी के लट्ठों की उपलब्धि की कोई समस्या नहीं आई जिनसे की यह तीनों तरह की नावे बहुत ही आसानी से बनाई जा सकती हैं. दूसरी बात, यहां के समुद्र में मछलियों की अत्यधिक उपलब्धता। कभी भी मछुआरों को पुराने समय में बहुत दूर मछली पकड़ने के लिए नहीं जाना पड़ा और ना ही बहुत देर तक समुद्र में रहने की कोई आवश्यकता उनके लिए आन पड़ी। एक-दो घंटे की समुद्र की यात्रा में ही उनके लिए प्रचुरता से मछली उपलब्ध हो जाती थी. आज भी व्यक्तिगत तौर पर कार्यरत मछुआरे के लिए इस नाव से मछली पकड़ लाना कोई मुश्किल काम नहीं। एक छोटी छोटी नाव लेकर जाना भी उनके लिए लाभदायक है, उससे भी जरुरत जितनी मछली पकड़ी जा सकती है.

After activities of Fishing, Varkala

इन नावो को मछुआरों द्वारा समुद्र में जाते हुए देखना जितना बांधे रखता था, उससे भी अधिक रोचक उनको वापस लौटकर साथ लाई गई मछलियों को निकालते हुए देखना था. इन नावो पर जाने वाले मछुआरे जाल में बंधे हुए ही मछलियों को लेकर आते थे. तट के समीप आने पर कई मछुआरे मिलकर इसे रेत तक खींचते थे और फिर उठाकर तट से ऊपर बीच पर ले आते थे. इतनी मेहनत का काम होते हुए भी मछुआरों का पेट निकला होना थोड़ा अचंभित करता था, लेकिन उनके हाथ कंधे और पीठ की मांसपेशियों सुदृढ़ हैं यह साफ दिखाई देता था. रेत पर ले आने के बाद मछुआरे मिलकर जाल को खोलते और उस में फंसी मछलियां, झींगे इत्यादि एक-एक करके हाथ से उस जाल से छुड़ाते. इस काम को करने के लिए बहुत ही धैर्य रखना पड़ता और हाथों को भी दक्षता से चलाना पड़ता ताकि मछलियां भी खराब ना हो.

जब मछुआरे लौट कर आते थे तो बच्चे जो अब तक पानी में किलोल कर रहे होते थे या फिर रेत पर सपनीले किले बना रहे होते थे, वे भी भागकर मछुआरों के साथ नाव को खींचने के लिए दौड़े चले आते थे और फिर रुक कर थोड़ी देर उन्हें मछलियों को अलग करता हुआ देखते थे. हालांकि हम कट्टर शाकाहारी हैं और मछलियों की बू हमें बर्दाश्त करना मुश्किल है, लेकिन इस तरह से लाई गई मछलियों में कभी बू नहीं आती क्योंकि नाव पर लदा जाल हर वक्त पानी से भीगा रहता है.

Crow foot print in sand at Varkala

मछुआरों के लौटने का इंतजार हम जैसे पर्यटक ही नहीं बल्कि काले कर्कश कव्वे भी करते थे. नाव के इर्द-गिर्द चलने से उनके पैरों के निशान बन जाते थे. जब मछुआरे जाल से मछलियां चुनते तो जो अनचाहे जीव जाल में फंसे होते उन्हें फेंकते जाते और इस तरह कौवों के लिए दावत तैयार होती जाती।

लहरें आकर बच्चों के रेत के किले और कौवो के पांव के निशान सब मिटा देती। उधर ढलते सूरज को देख कर मछुआरे भी जाल समेटने लगते। इस सब को देख कर एक कविता बरबस याद आ जाती-

जाल समेटा करने में भी
वक्त लगा करता है माझी,
मोह मछलियों का अब छोड़।

सिमट गई किरणे सूरज की
सिमटी पंखुरिया पंकज की
दिवस चला छिति से मुख मोड़

नींद अचानक भी आती है
सुध-बुध सब हर ले जाती है
गठरी में लगता है चोर

अभी क्षितिज पर कुछ कुछ लाली
जब तक रात न गिरती काली,
उठ अपना सामान बटोर।

जाल समेटा करने में भी
वक्त लगा करता है माझी,
मोह मछलियों का अब छोड़।

Sorting out the Catch

A basket is ready to be taken home!

Hands at work to sort fish.

Another Basket of Prawns is ready

Pulling the fish from net is Not an easy job!

यायावरी के अनुभव ही निराले हैं. आप आते हैं समुद्र पर मजा लेने बीचबम बनकर, और लौटकर जाते हैं समुद्र में मछली पकड़ने का थोड़ा सा ज्ञान और अनुभव और ढेर सारी यादें लेकर!
(वरकला के अन्य अनुभव अगली बार)

Travel Tips:

वर्कला कोच्ची से 170 km और त्रिवेंद्रम से 50 कम दूर है और रेल व् सड़क मार्ग से सीधा जुड़ा है.

हम वरकला अक्टूबर में गए थे जो कि off season है. उस समय बीच का काफी भाग समुद्र हड़प कर रखता है. दिसंबर और जनवरी यहाँ मुख्य सीजन है, लेकिन तब महंगा और भीड़ भरा होता है. लेकिन फिर भी कोवलम बीच से बेहतर रहता है.

वरकला में कई बीच है जैसे पापनासम बीच, ब्लैक बीच, ओडायम बीच आदि. सभी बीच और इससे आगे ऐडवा बीच तक भी खूबसूरत पैदल पथ से जुड़ा है. ये पथ नारियल के पेड़ों की छाँव में बीच के साथ ही चलता है और इसी वजह से वरकला बीच अन्य बीच स्थलों से अलग है.

3 Comments

  1. आपके ब्लाॅग पर आकर मन प्रसन्न हो जाता है। आपके लेख को पढ़कर पहली बार ये जानने को मिला कि मछलियों के समूह के आने के बाद समुद्र के पानी का रंग बदल जाता है।

  2. वाह समुद्री जीवन मछलीपालन जाल के प्रकार नाव की डिज़ाइन सब कुछ गहनता से लिखा है…बहुत ही बढ़िया पोस्ट

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *